आपके इश्क़ में ऐ यार हम कहाँ कहाँ तक पहुंचे
न जाना था कभी हमें हम वहां वहां तक पहूंचे।
बंदिशें लाख है वस्ल-ए-यार की राह में मगर
इसरार-ए-इश्क़ है कब हुस्न की सायबां तक पहुंचे।
न देखीं कोई सहर कभी मैने किरण मुहब्बत की
आरजू कि कोई शमां मेरे इस विरान मकां तक पहुंचे।
बड़ी आस लगाकर अब तक मैंने बंद रखी है अपनी जुबान
कि कल शायद मेरी सदा आप मेहरबां तक पहुंचे।
©anuragrahi
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