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गिरते आंखों से इसके आंसू,
लग रही वो गालिया इसे,
संदीप माहेश्वरी की प्रेरणास्रोत बाते,
फिर उठ चुका है ये, भाग लेने उस रेस में,
अब ललक है इसे जीतने की,
दोस्तो की गालिया कर गयी है काम दवाई का,
मृत होती भावनाओ पे संजीवनी का,
अब भाग रहा है ये अपनी मस्ती में,
फिर से जीने ,
फिर से रंग बिखरने,
फिर से उड़ने,
अब आत्महत्या नही , हत्या करनी है,
उस नकारात्मक सोच की हमेशा हमेशा के लिए।
©saurabh15