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9 अगस्त

खून से सनी थी उसकी आंखें
दर्द से हो रही थी उसकी बातें
और कुछ ही क्षणों में रुक गई उसकी सांसे
मनुष्यता को रौंदते ये दरिंदे
जो बने फिरते हैं आजाद परिंदे
जिनमे दया के भाव ही नहीं पसीजते
जो खून से लिपटकर भी अपने कृत्यो से नहीं खीझते
ऐसे जगन्य पापियों के रोंद दो घरौंदे
ऐसी सजा दो कि उनकी रूह सोचकर ही कौंधे
अपील करो ऐसे कानून की,
जिससे मिट जाए ऐसी खूनी राते
अन्यथा मनुष्य के सर्वनाश की आएंगे बाढ़े
और कुचले जाएंगे ये शरीर और जीवन के मांझे !!
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