एक लम्हा फूल बनकर
खिल रहा है तू
माँ के आँचल मे
खिल रहा है फूल जैसे
मासूमियत को लिये
बड़ रहा ह लम्हा लम्हा
जैसे कली खिल रही हो फूल
बनने के लिये
चूम रहा इस धरा को
अपने कोमल ओठों से
खींचता अपनी ओर
अपने निस्छल भव से
फूल सी खुसबू है तेरी
हर एक मुश्कान मे
बढ़ रहा है खुबसूरतू से पर
अंजान है तू इस जगत मे
©nihalnat
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