आ कर मेरे ख्वाबों को सर-ब-सर कर दो
सपनों में मेरे हकीकत का अमृत भर दो।
वीराने में कहां कहां भटक रही है रूह मेरी
जरा थामकर मेरे जिस्म में उसे बशर कर दो।
आज पुनम की रात है चहूं ओर उजाला है
रहकर साथ तुम मेरे शाम से सहर कर दो।
मैं तन्हा कैसे काट सकता जालिम लम्हों को
गले लगाकर मेरी तन्हाई मुख्तसर कर दो।
न भुलो कि किसी न किसी घर को है तुम्हें सजाना
मेरे हमराह बनकर तुम शुरू नया सफ़र कर दो।
©anuragrahi
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