अफसुर्दा से हो जाते हैं कभी - कभी शब में
अमलन कोई तसव्वुर में आता है
अब्तर सा वो असीर किसी की निगाहों का
आब-ए-चश्म बहाता है....
आहिस्ता- आहिस्ता दीर्घश्वास भरता वो
आगोश में समा जाता है
अहजान से भरा उसका सीना
गर्मी-ए-सोहबत कोई चाहता है.....
©deeprichu
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