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आज भी मैं इक अजीब अजाब में जी रहा हूँ ।

आज भी मैं इक अजीब अजाब में जी रहा हूँ
जाम के बदले खुद का लहु पी रहा हूं।
इस कदर फट चुकीं है जिंदगी की किताब
मर्जी पन्नौं की पुछ कर फिर किताब सी रहा हूं।
अरे मेरे गम-ख्वारों अभी सोने न जाओ
पास आकर तो देखो कैसी जिंदगी जी रहा हूँ।
कल महफिल भी होगी सितारें भी होंगे सिवा मेरे
तेरे गुनगुनाने को रूहानी गजल लिख रहा हूं।
काली काजल से भी गहरी रंग है गुनाहों की मेरी
लिबास-ए-स्फेद से ढकने की कोशिश कर रहा हूं।
©anuragrahi