आज इस शाम को न कहो हराम यारो
लो उठा लो एक एक और जाम यारो।
गम़ ने कर दिया है खोखला जिस्म इस कदर
सामने साफ दिख रहा है अंजाम यारों।
चाहा मैने जिन्हें उनसे इजहार कर न सका
यूंही मुफ्त में हो गए हम बदनाम यारों ।
आज जो दुश्मन है कभी माशुका थी मेरी
कैसे ले सकता हूं उनसे इन्तकाम यारों।
मेरे सामने आए तो जरूर मगर पुछा नहीं हाल
क्या यही है अनुराग के उल्फत का पैगाम यारों।
©anuragrahi
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