आज़ का मिजाज मेरा मिजाज मत पुछो
क्या खोया क्या पाया ये मत पूछो।
कुछ दिन के लिए जान-ए-मन भटक गई थी
कितना भटकाया कितना रूलाया मत पूछो।
हर रोज़ इबादत में उनके मैं ख़त लिखता
हर रोज़ किस तरह थी ठुकराती मत पुछो।
सांसें भर ही थी जां जिस्म हो गया था कंकाल
किस तरह कटती थी दिन और रात मत पूछो।
प्यार क्या है होता कैसे है न हुआ किसी से कभी
मगर उनके लिए मैं हों रहा था बिमार मत पूछो।
आज़ की मुझसे बात तो जैसे सारा जहां मिल गया
कितना खुश हैं अनुराग आज़ यार मत पूछो।
©anuragrahi
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