आज की नारी हो गयी नर पर भारी।
नर हुआ निकम्मा नारी दो धारी तलवारी।।
आज भी बहाती है आंसू, पर गुस्सा आ जाये तो धांसू।
पति की औकात नहीं और हुकुम ना दे सके सासू।।
तोहफा पाकर हो जाती खुश बड़ी।
खिलाओ गोल गप्पे और चटाओ रबड़ी।।
स्वार्थ इसका धर्म पति है सामान।
बना देती कुली पाकर के सम्मान।।
नारी का यह रूप बड़ा भयानक।
बना लिए इसने बड़े बड़े मानक।।
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©vikasgarg
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