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आज मैं खुबसुरत इश्क़ के लिबास में हूं ।

आज मैं खुबसुरत इश्क़ के लिबास में हूं
आज मैं तुम्हारे करिब बहुत पास में हूँ।
मैं कहीं भी रहूं या ना रहूं
मगर हमेशा तेरे इतिहास में हूँ।
तुम मुझे क्यूँ ढुंढती हो सर-ए-बाजार में
मैं तो तेरे दिद-ओ-निगाह में हूँ।
सबके सामने यूँ न निलाम करो मेरी हैसियत
अभी तो अभी मैं तेरे प्यार में हूँ।
जुल्म ढाने की ये जो है तेरी आदत
समझा करो,मैं मकतल-ए-यार में हूँ।
अनुराग क्यूँ तू समझता है सभी को अपना
वर्षों से तो मैं बेगानों के दयार में हूँ।
©anuragrahi