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आज मैं सरहद-ए-हुस्न-ए-यार पर हूँ।

आज मैं सरहद-ए-हुस्न-ए-यार पर हूं
जिंदा हूं मगर फकत तुम्हारे प्यार पर हूँ ।
बरसे आस्मां से आग या पड़े जिस्म पे कोड़े
खड़ा जो मै बारूद-ए-इश्क़ के आबार पर हूँ।
तुम बंद न करना महल-ए-दिल का दरवाजा
मैं बैठा तेरे निकलने के इंतजार पर हूँ।
जरा दिवारों की तरह मेरे जज्बातों को सुनो
मैं कब से तेरे किए वादों के ऐतबार पर हूँ।
कभी अकाएक अपनी जुबां से मुकर न जाना
रानी नुरानी अब मैं बर्बादी के कगार पर हूँ।
©anuragrahi