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आज मयकशी की तमन्ना है, मुझको मय पिला दो यारो, कहते हैं मय वफ़ा करती…

आज मयकशी की तमन्ना है, मुझको मय पिला दो यारो,

कहते हैं मय वफ़ा करती है, मुझपे दरिया-ए-मय बहा दो यारो।

मैंने टूटे हुए आशिक़ों को, महफ़िल-ए-मय में सँवरते देखा है,

डूबकर मय की मस्ती में, मौसम-ए-दिल को बदलते देखा है।

मयनोश से मय के जलवे सुने हैं, अंजुमन-ए-मय में नग़मे सुने हैं,

घूँट-ए-मय महबूब-सी हसीं है , घूँट ही सही मय पिला दो यारो।

मय से महफ़िलें रोशन होती हैं, मय से मयकश आबाद होते हैं,

मय से रौनक-ए-बज़्म बढ़ती है, मय से अरमाँ इजाद होते हैं।

मैं पीता नहीं हूँ हमदम साक़ी, मय को मरहम-ए-दिल कहते हैं,

दिल करता है आज़मा कर देखूँ, मुझको मयकदा दिखा दो यारो।

© विशाल सैनी

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