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आज फिर ये ख्याल आया है

आज फिर ये ख्याल आया है
आज फिर एक सवाल मेरे ज़ेहन की वीरानियों में उभर आया है…
क्यों सिर्फ़ मुझे ही तेरी यादों का अज़ाब नसीब हुआ है?

क्यों मेरी ही रातों को तेरी यादों ने बेचैन किया है,
क्यों मेरी ही पलकों ने अश्कों का दरिया चुपके से बहाया है…

क्यों हर लम्हा तेरा इंतज़ार मेरी ही रूह की आदत बन गया,
क्यों मेरे ही हर ख़याल पर तेरा नाम लिखा गया…

क्यों मोहब्बत की हर रस्म मैं ही अदा करती रहूँ,
क्यों वफ़ा का हर इम्तिहान सिर्फ़ मेरा दिल ही देता रहे…

क्यों मैं ही हर दफ़ा दिल को समझा कर सब्र का दामन थाम लूँ,
और तू मेरी ख़ामोश तड़प से यूँ ही बेपरवाह गुज़रता रहे…

क्यों तुझे मेरी बेचैन रातों का एहसास नहीं होता,
क्यों तुझे मेरे इंतज़ार की ज़रा सी भी प्यास नहीं होती…

लगता है इश्क़ का ये दस्तूर भी कितना संगदिल है…
एक दिल टूट कर भी वफ़ा निभाता रहता है…
और दूसरा उस वफ़ा कि कदर भी नहीं करता है
बड़ा तंग दिल है...

-शिवन्या