आज़ाद परींदा उड़ चला है
हवाओं का रुख बदल चला है
देख इंसान की मजबूरियाँ
रब के पास दरियाफ्त करने को चला है
आज़ाद परींदा उड़ चला है।।
सदियों से क़ैद था पिंजरे में
ना थी उसकी कोई खतां
ना थी उसकी कोई जुर्म
फिर भी वो किसी की शौक के खातिर
खुद को खुद में क़ैद कर चला है।।
आज़ाद परींदा उड़ चला है
हवाओं का रुख बदल चला है
देख इंसानो की लाचारी,
अपने गम भुल कर
हम सबको वो माफ कर चला है
आज़ाद परींदा उड़ चला है।।
©candor
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