आखिरत की जुस्तजू...
जब देखता हूँ नक़्श- ओ- निग़ार चीज़ों में यहां
खो जाता हूँ आखिरत की नक़्श- ओ- निग़ार में
यहाँ की रौनक़ क्या रौनक़ है जो चन्द दिनों मे फानी है
रौनक़ तो आखिरत की रौनक़ है जो हमेशा बाक़ी है
लोग खो गए इस रौनक़ में आखिरत को भूलकर
फानी नेमत से दिल लगा बैठे बदरजहा बेहतर को भूलकर।
-- शहज़ाद रशीद
©shahzad
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