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"आंतरिक कथन "

कभी मुस्कुराता हूं कभी कमजोर सा हो जाता हूं
ईश्वर को सिर झुका उनके अनुभव में खो जाता हूं
कुछ कह ना पाता हूं ,
लेकिन आंखों के गीलेपन से वाकिफ हो जाता हूं
अपने ही कुछ शब्दों से आंतरिक सीमा में मौन हो जाता हूं गुजरते वक्त के सहलाने को महसूस कर पाता हूं
पर गंभीर उसकी बातों को समझ भी जाता हूं
मैं खुश रह कर भी गहरी शांति चाहता हूं पर पता नहीं ,
इन बंधनों से फिर मैं कैसे उलझ जाता हूं
आवरण की चकाचौंध में बंधता चला जाता हूं
ईश्वर के आंचल की गहराइयां चाहता हूं
और अपने इन इरादों को समेटता जाता हूं। ।
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