आओ देख लो जश्न-ए-मसरर्त क्या है
किसी से दिल लगाने में ये कुर्बत क्या है।
तुम्हें जो मिली है जानिब जाजिब सा बदन
कहीं भी रहो तेरे लिए ये गुरबत क्या है।
हम है आशिक दिलजू तुम पर मर मिटने वाले
तू क्या जानो ये दर्द-ए-फुर्कत क्या है।
हमनवा मेरे हमनफस दोस्त बनकर तू दगा न दे
अभी के अभी आए हो रूठने की जरूरत क्या है।
दिलकश अंजुम से रूकसती का हो जुरर्त क्यों
हमने जो दिया शायद समझे नहीं ये मुरव्वत क्या है।
आग लगि है आज दिल टुटा अनुराग का पहली बार
समझा नहीं कोई अब तक आखिर दिक्कत क्या है।
जश्न-ए-मसरर्त - खुशी का तैयारी
जानिब - किसी लड़की या औरत के लिए संबोधन
जाजिब - मनमोहक
कुर्बत - नजदीकी
गुरबत - परदेश में रहना
दर्द-ए-फुर्कत - जुदाई का दर्द
जुर्रत - साहस
मुरव्वत - मानवता
©anuragrahi
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