आपकी रूखसत ने छोड़ा आज न कहीं का मुझे
छुट गई महफिल जहाँ मिल रहीं थी इज्जत मुझे।
ख्वाब में सोंचा न था जो वो हुआ है मेरे साथ
गम की एक पैरहन पहनाकर छोड़ गई तन्हा मुझे।
किस कदर बसर अब होगी तेरे बिन ये रात दिन
खोया खोया है ये दिल तड़पा रही तेरी यादें मुझे।
रूठ कर जाना ही था तो क्यों आई जिंदगी में तुम
क्या मुझे जख्मों की कमी थी जो दे गई नया मुझे।
अब नहीं चढता नशा मय हो या हो जहर
यूं तेरी फुरकत ने फकत बना दिया है अमर मुझे।
तुम हमेशा खत में लिखना हालात और अपना पता
मिलने मैं जरूर आऊंगा मिली गर जिस दिन मौत मुझे।
©anuragrahi
S