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आरंभ-अंत

इस जीवन की परिपाटी में ,
शुरुआत हुई है माटी में ,
तिनके से बदल बदलकर ,
शरीर परिणित हुआ लाठी में ,
अस्थिर इस समावेश में ,
डूब रहा वो झूठी ख्याति में ,
कभी उलझता जाति में ,
संग्रहण में डूबा उसका तन ,
घिस रहा कदकाठी में ,
और हो रहा खत्म तेल उसकी ,
आंतरिक ऊर्जामयी बाती में ,
और हो रहा है अंत,
उसी शुरुआती माटी में ।
उसी शुरुआती माटी में ।।
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