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आशा की निराशा

बिजली चमकी,बादल  गरजे, छाई घटा घनघोर,
बारिश की आशा से, मनमोर  हुआ  विभोर,
कागज की कश्ती ले घूमें, बच्चे मचाते शोर,
पर ये क्या?
बादल भागे,
बिजली थमकी,
ना पानी, ना धरती भीगी,
ये कैसी बेईमानी?
इतनी आशा हमें दिला,
जा के बरसा रहे, कहीं ओर पानी...
🌹🌹🌹
©vicky