चांद की रात मैं तेरे घर को आऊंगा,
इलतजा है मेरी तू घर पर ही रहना।
नहीं ढो सकता अब बोझ सिने में,
ब्यां करनी है दास्तां घर पर ही रहना।
रवायत नहीं कोई कि फुरकत बनी रहे,
गुनाह करे कोई जुल्म हम सहे।
क्या फायदा जिंदगी घुंट घुंट कर जीने में,
नाजुक है मेरे हालात घर पर ही रहना।
ख्वाब में आजीज मैने एक मंजर देखा,
उफनता हुआ खौफनाक समन्दर देखा।
समा न जाए कहीं अपने कबिले में,
मुसलसल चढ़ रही हैं मेरी बुखार घर पर ही रहना।
आज हर मर्ज की दवा है बाजार में,
मैं अब भी पड़ा हूँ नुस्खे के इंतजार में।
सिरकत हो गई है आंसूओं की निगाहों में,
मैं टुटा हूँ पहली बार घर पर ही रहना।
©anuragrahi
S