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आत्मा की यात्रा: सत्य से शुद्धि

आत्मा की यात्रा: सत्य से शुद्धि

मैं मोह पाश में बंधा

कर्म करता जा रहा

मैं लोभ भंवर में झुका

त्याग करता जा रहा

मैं तिमिर में आंख मिच कर

अखंड ज्योत जला रहा

मैं मिथ्या इस जगत में रह

सत्यता खोज रहा

धीमी धीमी आंच पे

मैं आत्मा जला रहा

इस आत्मा की आंच पे

मैं शुद्धि यज्ञ कर रहा

एक पग धरा में बांध

मैं नभ को मापने चला

दो कोष जल, सिर पे धरे

मैं समुद्र भरने चला

माटी के इस शरीर को

मैं तपा रहा हूं स्वर्ण में

पर अमूल्य इस हृदय का

मैं रक्ताभिषेक कर रहा

मैं जल रहा मैं मर रहा

पर हार को न जनता

उत्कृष्टता की होड़ में

मैं माटी में मिलता जा रहा।