अर्जुन:हे प्रभु आप कहते जिसे योग है, मन है चंचल बढ़ा उसको पाने ना दे,
ध्यान तो दूर है ध्यान के द्वार तक मुझको जाने ना दे,
भगवान: कर्मफल में अनासक्त रहकर पार्थ कर्तव्य का पालन करे,
वही सच्चा है सन्यासी संसार में, वो योगी है जो कर्म से ना डरें,
मन को बांधे बंधे, इसको साधो सजे, अपना मन पहले विष्णु चरण में धरो,
कामनाओं से मुक्त तुम हो जाओगे, पहले समभाव का तुम वरण तो करो,
ये विषय वासना, इनको त्यागे बिना, जग में योगी की पदवी नहीं पा सके,
भक्ति के योग में तृप्त हो आत्मा, ध्यान को जा सके, ध्यान को पा सके,
मन को वश में करों, मन बड़ा मित्र हैं वरना ऐसा शत्रु मिलेगा कभी नहीं,
मन को जीता हुआ पा ले परमात्मा, सुख में कुछ भी नहीं दु:ख में कुछ भी नहीं,
हे प्रभु आप कहते जिसे योग है, मन है चंचल बढ़ा उसको पाने ना दे,
ध्यान तो दूर है ध्यान के द्वार तक मुझको जाने ना दे,
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©vikasgarg
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