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अब बांध के साज-ओ-समान ले चलो ।

अब बांध के साज-ओ-समान ले चलो
जाओ जहाँ मुझे भी साथ ले चलो ।
तुम्हारे पास रहने की इक आदत हो गई
इस बेगंध फुल को भी अपने साथ ले चलो ।
मेरा सहर तो तुम्हारे सहर जैसा नहीं होता
मरूभूमि के इस शजर को भी साथ ले चलो ।
तुमने बहुत सजाएँ हैं ख्वाब अपने दिल में
मेरा भी इक ख्वाब अपने साथ ले चलो ।
कब तक बना रहेगा मुंतज़िर उल्फत का अनुराग
बसा कर मुझे दामन में अपने साथ ले चलो।
©anuragrahi