अब इन आंखों ने मटकना छोड़ दिया
हर किसी पर बहकना छोड़ दिया।
अब शुभ घड़ी हो या आजाब का आलम
बेवक्त बेवजह ये फड़कना छोड़ दिया।
है बेमुराद हो गई ये टकटकी भरी आंखें
धड़कनों की सुन आब टपकना छोड़ दिया।
तेरे याद में अब भी बेनिंद हूं जानेमन
दिन को घर से निकलना छोड़ दिया।
ये सुनापन और ये तन्हाई की जिन्दगी
पर रातों को करवट बदलना छोड़ दिया।
देखते हैं जिस्म में हिफाजत है कब तलक रूह की
अनुराग ने हिफाज़त-ऎ-रूह करना छोड़ दिया।
©anuragrahi
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