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अब इस दौर में सब कुछ भुल गया हूं।

अब इस दौर में सब कुछ भुल गया हूं

मेरे मर्ज का दवा क्या था दवा भुल गया हूं

भटकते भटकते आब-ओ-दाना की तलाश में

मैं अपने सरजमीं का हवा भुल गया हूं

कभी बुलाती थी जो महफिलें आब-ओ-हवा

वो दयार-ए-इश्क का दिल जवां भुल गया हूं

उन्हें बड़ी जल्दी थी मुझे भुल जाने की

मैं भी उनके बाद रूह-ए-रवां भुल गया हूं

क्यूं ऐसा लगता है कुछ तो है मेरा उस घर में

आते आते शायद कोई किमती समां भुल गया हूं।©anuragrahi