अब इस विरान सफ़र में है ये मरहला किन के लिए
उठ चली मैयत की डोली फ़िर श्रृंगार किन के लिए।
है ये इश्क का श्रृंगार सभी श्रृंगारों से कुछ अलग
मुझे सादगी में ही दफ़न कर दो ये सेहरा किन के लिए।
अब नहीं लौट कर आऊंगा कभी मैं देखने बहार
तुम लगा रहे हो इस दश्त में गुलाब किन के लिए।
क्या कमी रह गई जो वो मेरे सिवा है दुनिया के
मैंने खुबसूरत जिंदगी छोड़ दी जिन के लिए।
बागबां कोई कली हल्के रंग की ऐसी उगाओ
भेजना है मुझे उसे किसी हसीं कमसिन के लिए।
हर रोज़ हो रहा है मुक्तसर मेरे रूखसती के दिन
अंगुलियों पर गिन रहा अनुराग जो दिन थे खुशी के लिए।
©anuragrahi
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