अब इश्क करने की वो तौर-तरीके नहीं रहे
अब वो मजनू वो लैला हिर रांझा नहीं रहें।
वैसे तो हुस्न वहीं है जो पहले हुआ करती थीं
बदन पर पहले जैसी उनके कपड़े नहीं रहें।
कभी बन गया था जो मेरा प्यार इक मिसाल
वो तिश्नगी वो ख़्वाब-ओ-ख्याल अब नहीं रहें।
बिगड़ चुके हैं रिश्ते दरमियां खड़ी हो गई दिवार
एक-दुसरे से मिलने-जुलने को रास्ते नहीं रहें।
जज्बा उतर गया है और बच गए है फकत शुल
दास्तान-ए-मुहब्बत सुनाने के लिए हर्फ नहीं रहें।
सर अब झुक रहें हैं प्यार के आगे अनुराग मगर
अफ़सोस तो ये है कि प्यार के सजदे नहीं रहें।
©anuragrahi
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