"अब कोई नहीं कहेगा....
उठो सिया श्रृंगार करो तुम "
क्योंकि अब सिया श्रृंगार नहीं करती, रक्त बहाती है।
कोई नहीं कहेगा, "अपने हाथों में मेहंदी सजा लो..." क्योंकि उन हाथों पर अब किसी निर्दोष के ख़ून का रंग चढ़ चुका है।
कोई नहीं कहेगा, "चूड़ियाँ पहन लो..." क्योंकि उसकी कलाईयों को चूड़ियों से नहीं, बेड़ियों से सजना था।
कोई नहीं कहेगा, "लाल सुर्ख जोड़ा पहन लो..." क्योंकि उसे दुल्हन का लाल नहीं, जेल की सफ़ेद साड़ी ज़्यादा रास आई….
कोई नहीं कहेगा, "आँखों में काजल लगा लो..." क्योंकि उसकी आँखों में अब काजल नहीं, ख़ून उतर आया है।
कोई नहीं कहेगा, "पैरों में पायल पहन लो..." क्योंकि उसके कदम अब किसी आँगन की ओर नहीं, शिकार की ओर बढ़ते हैं।
और अब कोई नहीं कहेगा, "सिया... दुल्हन बन जाओ..."
क्योंकि जिसने कभी सपनों का घर बसाना था, उसने अपनी तक़दीर में हत्यारिन बन जाना लिख दिया। :::
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