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अब क्या कहूँ तुझसे... तूने मेरी किताबों के पन्ने पलटकर नहीं देखे, उनमें दबे…

अब क्या कहूँ तुझसे...

तूने मेरी किताबों के पन्ने पलटकर नहीं देखे,
उनमें दबे सूखे गुलाबों को छूकर नहीं देखा।

तूने उन लफ़्ज़ों को पढ़कर नहीं देखा,
मेरी कविताओं में खुद को ढूँढकर नहीं देखा।

तूने मेरी जगह ठहरकर नहीं देखा,
मेरी आँखों से बहते आँसुओं को महसूस नहीं किया।

दिखाता तुझे मोहब्बत की असली तासीर मगर,
तूने कभी मेरा होकर नहीं देखा।