अब उन्हें रखें कि दिल से निकाल दिया करें
समझ में नहीं आता हम अब क्या करें।
हर शाम मयकदे में गुजरती है जरूरत नहीं तेरी
मगर ये यादें घर कर गई है दिल में क्या करें।
दिला देती है याद गुज़रे लम्हों को हल्की-हल्की बारिश
तन्हा बैठकर इसमें भिंगने के सिवा अब क्या करें।
बस इक ख्याल है कि आंखें मुंद कर गुलाबी धुप में
देर तक बहुत देर तक तुझे हीं देखा करें।
दिल,दिमाग, ग़ज़ल, शायरी जो है मेरे पास
अपने हर दरीचे से बस तुझे हीं सोंचा करें।
तेरे बाद ये घर नया है और यहां के सब लोग नए है
संयोए है जो पुराने काग़ज़ अनुराग इन कागजों का क्या करें।
©anuragrahi
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