अब ये वादियां हमें रिझाने लगें
खिले फूल यहां के दिल बहलाने लगें।
किस बगिचे से होकर गुजरा हूं मैं
कि बदन से उसकी खुशबू आने लगें।
कभी भी तो वो पलकों पर रखा करें
फिर से हम अपनी रजा दुहराने लगें।
याद अब भी मुझे है वो कॉलेज के दिन
किताबों में थे जब ख़त आने जाने लगें।
हुई शाम यादों की इस दश्त में
ये तन्हाई बहुत अब सताने लगें।
अब है बस्तीयां वहां से दिल की उजड़ गई
बसाने में थे अनुराग जिसको जमाने लगें।
©anuragrahi
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