यूं तो गुनहगार हम भी ना थे ,
लेकिन सरे आम गुनहगार बताया गया।
अदालतों पर मुकदमा भी चलाया गया ,
जिन पर खुद से भी ज्यादा यक़ीन था ,
उन्हें कटघरे में भी बुलाया गया ।
सारी दलीलें उनकी ही थी,
जिन्हें गवाह बनाया गया ।
फिर फैसला भी क्या था ,
हमें फांसी पर लटकाया गया ।
जब कारवां उनका एक दिन बिखर गया,
तो उनसे आंसू भी बहाया गया।
©sandeepgup
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