सृष्टि की इस रचना को नमन हजार है
जिस के आंचल में पल कर,
हृदय हमारा कृतज्ञता से तार है
जिसमें साहस दृढ़ता बल की भरमार है
जिसके हृदय में दयालुता सवार है
समाज की मिथता में किया
जिसने अपने वास्तविक व्यक्तित्व से किनार है
हर एक वस्तु में उसका भी अधिकार है
उसको तोलते इस संसार पर धिक्कार है
ईश्वर की दयालुता पर किया उसने प्रहार है
यह पूजनीय मूरत ही उसकी उत्पत्ति का द्वार है
इसे समझना ही ईश्वरीय मोक्ष की दरकार है
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