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" अधूरापन "

संसार के संग हम बहते जा रहे हैं
भीतर की पीड़ा को सहते जा रहे हैं
धैर्य का संदेश उससे कहते जा रहे हैं
और कर्म की गरिमा में बहते जा रहे हैं
जाना चाहते दूर कहीं पर
बंधन की सीमाओं में ही रहते जा रहे हैं
उन अनसुलझे पहलुओं को ,
दरमियान में रखते जा रहे हैं
तलाश में उनकी हम भीतर में ठहरते जा रहे हैं
और संसार की अधूरी पगडण्डियाँ में चलते जा रहे हैं
भीतर की अस्थिरता को पीते जा रहे हैं
और बाहर की स्थिरता में जीते जा रहे हैं
कैसा अधूरा सा जीवन हैं हमारा
भीतर में ना पूर्ण जा पा रहे हैं
ना बाहर ठहर पा रहे हैं
अश्रु ना बाहर दिख पा रहे हैं
ना भीतर में रुक पा रहे हैं
समय की तलाश में ही ठहरे हैं हम
ईश्वर के इशारे इस जहाँ से चले जाएंगे
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