तुम्हे ईद का चांद! बिल्कुल नहीं कहूंगी!
तुम तो हर रोज मेरी आंखों के सामने रहते हो
बस बैठे बैठे तेरे इस चंचल मुखड़े को निहारा करती हूं
तेरी चांदनी की परछाईं में खुद को देखा करती हूं।
यौवन यामिनी के बीच शीशे से चमकते हुए,
नीले अम्बर में! जब तुम ऐसे इतराते हो ,
पूर्ण होकर भी तुम अधूरे से हो जाते हो।
©anusingh
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