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अहसास-ए-फर्ज

गांव मिला, घर मिला विरासत में,
बिबी साथ आई मेरी जमानत में।
मै बादाकश एक जगह रहता ही नहीं,
कौन शक्स होगा मां बाप की हिफाजत में।
ताउम्र मैने औरों का कर्ज-ए-एहतराम लिया,
लोग क्या क्या न कहेंगे हिकारत में।
आज मेरे सब रिश्तेदार खुद कर्जदार हो गए,
क्या यही होता है फर्ज-ए-तिजारत में।
वस्ल-ए-वफा पर ही टिकी है दुनिया,
क्या कोई आएगा मुझे मिलने मेरी हिरासत में।
कौन शक्स था रहनुमा मेरा किस से थी अदावत मेरी,
पहचान नहीं कैसे करूँ ब्यां मैं अपनी इबारत में।
अब उन्हें निंद क्यों नहीं आती चैन क्यों नहीं पड़ता,
क्या कोई कमी रह गई है मुझसे बगावत में।
जस्न-ए-दौर भी गुजर जाए तो सिकवा नहीं जिंदगी से,
एक आईना है महफूज़ अब भी मेरी शराफत में।
©anuragrahi