तूने जो मुझपे ये इलजाम लगाए हैं सनम
असली अहसासों से ज़रा दूर रही लगती है
मेरी मजबूरी तुझे तब ही समझ आ जाती
खुद की अौरत में जरा मर्द बसाया होता
तूने बदमाश अौ चालाक मुझे कह तो दिया
सच अौर ईमान को खुद का हुनर बतलाया
सारा फसाद तूने मुझ पे ही डाला क्यूं है
इसमें कुछ अपना हुनर तू भी दिखा सकती थी
तूने तो जितने गढ़े सारे अफसाने ही गढ़े
मैने तो सबको हकीकत से भी ज्यादा समझा
तूने दौलत को समेटा मेरी दौलत तू थी
जानते बूझते हकीकत को नकारा मैने
मैने तुझसे कोई रंजिश तो कभी रखी नहीं
तेरे इलजाम को आंखों पे संभाला है मैने
तेरे गुस्से को जो पी के भी मैं नाराज नहीं
अपने जज्बात में एक अौरत को भी पाला मैने
- उमाशंकर 🌷
©yogamity
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