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ऐ दोस्त अब तुम तुम न रहें हम हम न रहें ।

ऐ दोस्त अब तुम तुम न रहें हम हम न रहें
वो इकरार वो इंतज़ार अब वो इजहार न रहें।
कुछ कदम दूर क्या चला रिश्ते थिरक गई
वो प्यार अब वो अंदाज-ए-गुफतगू न रहें।
सितम ये नहीं कि हरारत भरी है मेरी जिन्दगी
सितम ये है कि पहले सी अब वो चारा़साज न रहें।
फलक में उड़ते परिंदों को नशेमन की जरूरत ही क्या
सरज़मीं में हूं काफी है अब क्या गर जमीं न रहें।
आप ने भी वहशी समझ है शायद मुह फेर लिया
ऐ दोस्त वो इंसां नहीं गर उसमें कोई कमी न रहें।
©anuragrahi