ऐ ज़िंदगी तू मुझपे भरोसा ना कर,
तेरे साथ रह, काफ़ी कुछ सीखा है यहाँ.,
भरोसे की सीढ़ियों पे तो चढ़ा एक दफ़ा,
गिर के जहाँ से, टूट के रहा था मैं खड़ा.,
वो मंजर भी याद रहा, जो कभी सीख देकर गया,
वो लोग भी दिल में गड़े रहे, जो भरोसे का असली मतलब समझा गए.,
ऐ ज़िंदगी तू मुझपे भरोसा ना कर,
तेरे साथ रह काफी कुछ सीखा है यहाँ.,
कुछ रंग लोगों ने दिखाए तो कुछ तूने बतलाए,
काश इस अजीब सी दुनिया का मतलब कोई हमको समझाए.,
किसी को तोड के मज़ा मिला तो किसी ने जोड़ के तोड़ा है हमको,
ना जाने क्या मिलता है रोता देख के यहाँ सबको.,
ऐ ज़िंदगी तू मुझपे भरोसा ना कर,
तेरे साथ रह काफ़ी कुछ सीखा है यहाँ.,
कोई भरोसे के लायक नहीं, ये हर मोड़ पे तो जताया है तूने,
खुदगर्ज़ यहाँ सब हैं, ये हर रोज़ ही तो बताया है तूने.,
तेरे साथ रह, तुझमे ही खो, तुझसे ही सीखता मैं रहा,
ज़िंदगी बचाने के लिए बिन चाहत के देखो मैं तुममें घुलता ही गया.,
ऐ ज़िंदगी तू मुझपे भरोसा ना कर
तेरे साथ रह काफ़ी कुछ सीखा है यहाँ,
जो था कभी उस लोहे की तरह,
टूट टूट के मैं भी बदलता ही गया.,
हाँ सब सेहता तो गया मगर रगो का लहू अब विष में ढलता ही गया,
सीधा - सादा सा वो दिल, हैवान में बदलता गया.,
ऐ ज़िंदगी तू मुझपे भरोसा ना कर
तेरे साथ रह, मैं काफ़ी कुछ, सीखता ही गया.
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