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ऐसे भी कुछ अपने

ऐसे भी कुछ अपने निकले
उससे सच तो सपने निकले
दुनिया को बाजार बना कर
आज वही खुद बिकने निकले
कोई शिकवा काम न आया
साहब इतना चिकने निकले
सुनते थे तब अच्छे थे हम
बुरे हुए जब कहने निकले
चाल से वो पहचाने जाते
जो रोज मुखौटे पहने निकले
जिनके आँशु बोल न पाए
वही बगावत करने निकले
राह छोड़ दो जल जाओगे
अब आग के आँशु बहने निकले।।
© - कुमार सम्भव दीक्षित(रावण)
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