महजाबीन तेरी सुरत का असर है मुझपर
मर्ज-ए-गम की हर दवा बेअसर है मुझपर।
किस से कुछ तलबगारी की गुस्ताखी कैसे करें
हर शख्स का हिस्सा-ए-अहसान है मुझपर।
जा मैंनें तुझे अपने गम में किया मुआफ
तू मुआफ कर और अहसान न करना मुझपर।
अभी कितने पत्थर टुटने बाकी हैं और इस दिल पर
याद इतना न आओ कुछ रहम करो मुझपर।
अब किस सांस किस हवा पर एतबार किया जाए
अकाएक रूक जाती है आजमाया है खुद मुझपर।
अनुराग तेरे नाम में पहली सी राग न रही
मयकशी कर लो हंसेंगे और क्या क्या कहेंगे मुझपर।
©anuragrahi
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