इश्क़ भी तुम हो, ख्याब भी तुम हो
डायरी के पन्नो में उतरे अल्फाज भी तुम।
सर्द में खिड़की से आती मीठी धूप सी तुम
बगिया में खिली गुलाब की कली भी तुम।
तुम ही हो सपनो से भरे नयनो में
देर रात की करवटों में भी हो तुम।
अब मेरी कलम को अल्फाजो से मोहब्बत हो गयी है
जबसे तुम स्याही बनकर पन्नो पर उतरे हो।
©piku
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