बडा अनमोल रिस्ता है.
ये शादी का,
विलीन हो जाये प्रिय वर मे ,
तो है आबादी का
वरना है बरबादी का ।
कैसा रिस्ता है, ये हिस्सेदारी का ,
विक्षुप्त क्रिया मे रहकर,
गृह की बातें सहकर
सब कुछ है,
अब जिम्मेदारी का ।
चन्द गलियारों मे रहकर,
नहीं बचा कुछ
अब आजादी का ।
बडा अनमोल रिस्ता है,
ये शादी का ।
©sandeepgup
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