ये तेरी अनसुनी सी झिढ़कीया !
जैसे सहर में हौ उगते सूरज पर बदलियां !
यह तेरी बोली है बाराना !
शायद बातों में मैं तुझसे उलझ गया !
तेरा रौब है जैसे गर्म चाय की प्यालीया !
उसमें उठता गरमागरम भांप का धुंआ !
मेरे बदले हालात के पहलुओं पर ध्यान दें !
और बदले हुए जज्बातों को नजरअंदाज कर !
चर्चा यह भी है कि तू मुझे चाहने लगी है !
अक्सर यह अफवाह अब उड़ने लगी हैं !
तेरी अगुवाई मैं उथल पुथल हैं मेरे हालात !
इस नाज़ुक दौर में भी तेरा रुतबा कायम है !
फैसला हवाओं ने भी सुनाया है अब!
मुझे तुमसे बंधंकर जीना पड़ेगा !
मयंक नरुका
©Mayank Nar
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