मैं जग से यूं आस लगाए,
बैठी रही विश्वासी ।
जग को कैसी प्रीत है मोसे,
ये जग मोरा आभासी ।।
काजर कालिख मुंह पे लाग्यो,
मैं दर्पण पोछन लागी ।
मन के भीतर की उथल पुथल से,
मैं बचत फिरत हूं जाती ।।
मन कहत जात साची बतियां,
मैं दुनिया से पूछत जाती ।
जो नेह लगाती खुद से तो,
जग से काहे आस लगाती ।।
~ संस्कृति
©mehr_o_mah
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