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" अन्त:खोज "

दुनिया के बंधन से छूट रहा हूं
मन के गलियारे मे झूम रहा हूं
अंधियारे से निकलकर उजियारे में घूम रहा हूं
सितारों की चाह लिए उन्हें ढूंढ रहा हूं
मौसम की मासूमियत में सब कुछ भूल रहा हूं
प्रकृति से रिश्तों के गहरे धागे बुन रहा हूं
मुसाफिरों की बस्ती में मुसाफिर बन के घूम रहा हूं
पर भीतर की राहों को कदमों से चुम रहा हूं
ईश्वर के साए की खोज में झूम रहा है
राही हूं खुद में ही खुद को ढूंढ रहा हूं
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