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" अंतर्भ्रमण "

स्वयं के सवालों का जवाब हो तुम
जीवन के हर इम्तेहान का दरमियान हो तुम
संसार की कश्तियों की पतवार हो तुम
ईश्वर सी निर्मलता का द्वार हो तुम
मासूमियत के भाव का फरमान हो तुम
मिथ्य इस संसार से परे ,
अद्भुत कला के पहरेदार हो तुम
क्यारियों में खिले फूलों की मंद मुस्कान हो तुम
खुद को जानने के स्वयं ही हकदार हो तुम
हृदय की मासूमियत को देखती निगाहों की पहचान हो तुम
ईश्वर के सुकून के रहमान हो तुम
और उनके हृदय का छोटा सा मकान हो तुम
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