किसी मजबूर व्यक्ति की आंखों को निहारना....
और उसकी नमी को अपने दिल में उतारना....
उसकी सच्चाई का भीतर को गवाह बनाना....
और उसकी सरलता को व्यक्तित्व का आधार बनाना...
उसकी मुस्कुराहट से प्रयासों की भीतर में नाव बनाना..
उसकी मेहनत से अपने अंतर्मन को अवगत कराना...
उसके स्वरूप में ईश्वर की इबादत का मंजर बनाकर ईश्वर के घर का दरवाजा खटखटाना...
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